Thursday, December 11, 2025

ग़ज़ल

देर हो जाएगी जाने में मगर चलते हैं,

बहुत भटक चुके हैं दोस्त, कि घर चलते हैं।

एक मुद्दत से यही हादसा गुज़रा हमपे' - 

पाँव ठहरे हुए हैं और सफर चलते हैं।

जब, जहाँ हमको था जाना वहाँ चले तुम भी,

अब जिधर तुमको तमन्ना है, उधर चलते हैं।

ये टेढ़े रास्ते अब खौफनाक लगते हैं,

कोई सीधी सी चले ऐसी डगर चलते हैं।

शाही राहों पे' हुआ करती है मुर्दों की परेड,

अनगिनत जिस्म कटाये हुए सर चलते हैं।

2 comments:

  1. बहुत खूब द्विवेदी जी! इस ग़ज़ल की रचना के समय मैं आप के साथ था। यह मेरा सौभाग्य है कि आपके श्रीमुख से कविताएं सुनने और समझने को मिलती हैं।

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    1. धन्यवाद, नदीम जी। आप जैसे सुधी श्रोता का साथ भी किसी उपलब्धि से कम नहीं हैं।

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