Thursday, December 11, 2025

ग़ज़ल

ये भीड़-भाड़, ये चहल-पहल भला क्यों हैं?

शाही अंदाज़ में हर रास्ता बदला क्यों है?

जो गरीबों की मसीहाई करने आया था,

वो अमीरों के रंग-ढंग में ढला क्यों है?

हर एक ज़ुबान पे' ताज़ा सा आबला क्यों है?

जलन है कैसी? हर एक दिल जला जला क्यों है?

खैर ख्वाही किये हुए महीनों बीत गए!

पूछते हो दिलों में इतना फासला क्यों है?

कितना आसान था जो दिल में है उसे कहना!

फिर ये सच बोलना पेंचीदा मामला क्यों है?

मिलन की शाम भी नखरों के बाद आई है!

आज सूरज भी इतनी देर से ढला क्यों हैं!!

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