मामला यूॅं भी न बिगड़ा होता;
जो जहाॅं था, वहीं रहा होता।
फैसले ठीक ठाक होते, अगरमुकाबले की बात तब रहती,
अपने जैसों से सामना होता।
सोच, किस तरह गुज़रती तुझ पे',
तू मिलने आता, और मैं ना होता!
गीत में फिर प्रीत की निर्बाध मादकता मिला दो | शब्द की तृष्णा बुझा दो, भाव की मदिरा पिला दो |
मामला यूॅं भी न बिगड़ा होता;
जो जहाॅं था, वहीं रहा होता।
फैसले ठीक ठाक होते, अगरये भीड़-भाड़, ये चहल-पहल भला क्यों हैं?
शाही अंदाज़ में हर रास्ता बदला क्यों है?
जो गरीबों की मसीहाई करने आया था,
वो अमीरों के रंग-ढंग में ढला क्यों है?
हर एक ज़ुबान पे' ताज़ा सा आबला क्यों है?
जलन है कैसी? हर एक दिल जला जला क्यों है?
खैर ख्वाही किये हुए महीनों बीत गए!
पूछते हो दिलों में इतना फासला क्यों है?
कितना आसान था जो दिल में है उसे कहना!
फिर ये सच बोलना पेंचीदा मामला क्यों है?
मिलन की शाम भी नखरों के बाद आई है!
आज सूरज भी इतनी देर से ढला क्यों हैं!!
देर हो जाएगी जाने में मगर चलते हैं,
बहुत भटक चुके हैं दोस्त, कि घर चलते हैं।
एक मुद्दत से यही हादसा गुज़रा हमपे' -
पाँव ठहरे हुए हैं और सफर चलते हैं।
जब, जहाँ हमको था जाना वहाँ चले तुम भी,
अब जिधर तुमको तमन्ना है, उधर चलते हैं।
ये टेढ़े रास्ते अब खौफनाक लगते हैं,
कोई सीधी सी चले ऐसी डगर चलते हैं।
शाही राहों पे' हुआ करती है मुर्दों की परेड,
अनगिनत जिस्म कटाये हुए सर चलते हैं।