Thursday, April 9, 2020

कैसी?

नहीं आना है जब उसको तो फिर तैयारियाँ कैसी?
बिना आसानियों की आस के दुश्वारियाँ कैसी?

जो मजबूरी का धागा था, उसे तो वक़्त ने तोड़ा,
भला नज़रें मिलाने में हैं अब लाचारियाँ कैसी?

गिला-शिकवा न कोई, दर्द का साझा नहीं कोई,
ठिठोली में महज ग़ुम जाएं जो, वो यारियाँ कैसी?

जलाना और खुद जलना, यही रिश्तों का ढर्रा है,
न ज़ख्मों पर नमक छिडकें तो रिश्तेदारियाँ कैसी?

पकड़ती हैं जो जिस्मों को, नहीं है उनसे डर इतना,
ये ज़हनों को जकड़ती जा रहीं बीमारियाँ कैसी?

जो इक घुड़की में  दब जाएं, दरी बनकर जो बिछ जाएं,
फिरें दफ्तर के गलियारों में ये खुद्दारियाँ कैसी?

जहाँ रंगों का मौसम था, वहाँ दंगों का मौसम है,
तो फिर मासूम हाथों में भला पिचकारियाँ कैसी?

Tuesday, January 14, 2020

जो कागज़ नहीं दिखाएंगे.....


उनको संबोधित एक कविता, जो आजकल ज़ोर-शोर से गा रहे हैं - "हम कागज़ नहीं दिखाएंगे...." :-

जब रामलला की जन्मभूमि पर मंदिर का मुद्दा आया,
है याद तुम्हें किस बेशर्मी से तुमने कागज़ माँगा था?
तुमको खुश करने की खातिर ट्रक-भर कागज़ बर्बाद गए,
सत्तर सालों तक रामलला को कोर्टरूम में टाँगा था |
अब तुमसे कागज़ माँग लिए तो क्यों इतनी बेचैनी है?
जो सच है, उसे कहो, क्यों झूठी भावुकता फैलाते हो?
'हम कागज़ नहीं दिखाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे'
बच्चों वाली अपनी जिद को तुम क्रांति-गीत सा गाते हो !
सबको अपनाता है भारत, सबको दुलराता है भारत,
फिर भी भारत है एक राष्ट्र, यह खुली सराय नहीं कोई |
अपने नागरिकों के सारे अधिकार सुनिश्चित करने का,
कागज़ देखे जाने से हटकर और उपाय नहीं कोई |
यह संविधान, गीता-कुरान, सदग्रंथ-ज्ञान, धन का विधान,
वेतन-पेंशन, शादी-तलाक, सब कुछ कागज़ के अन्दर है;
पैदा होने से लेकर के अंतिम यात्रा पर जाने तक,
हर एक मोड़ पर जीवन के बस कागज़ का ही चक्कर है |
माना सच्ची भावुकता कागज़ की मोहताज़ नहीं होती,
पर शासन की मजबूरी है, वह कागज़ से पहचान करे |
ऐसे में, देश-भक्त है जो, वह पहले कागज़ दिखलाए,
घुसपैठ पकड़ पाने में यूँ शासन का काम आसान करे |
उनको भी जाकर समझाए जिनको कागज़ की समझ नहीं,
किस-किस कागज़ से काम चलेगा, यह सब उनको बतलाए |
हाँ, देश-प्रेम की आड़ लिए जो अपने हित को साध रहा,
उससे यह नम्र निवेदन है, वह खुलकर सम्मुख आ जाए |
इसलिए कि हठ-धर्मी होकर जो ऐसे गाने गाएंगे -
'हम कागज़ नहीं दिखाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे',
उन सबको ध्यान रहे इतना यह बीस-बीस का भारत है,
वे ढंग से कूटे जाएंगे, दौड़ाकर सूते जाएंगे |

Friday, September 27, 2019

हाल हमारा जाने है

कही न जाए बात प्यार की, ज़ुबाँ क्यों अटक जाती है?
बात गले तक आते-आते जाने क्यों थक जाती है?
कैसी है उधेड़बुन जिसने उलझाए रखा मन को?
क्या है यह कस्तूरी जो भरमाए जाती जीवन को?
लगातार भटकाती जाए भूल-भुलैया भावों की,
रह जाती है बहुत ज़रा सी गुंजाइश ठहरावों की |
ठहरावों में सदा रही फिर नए सफर की तैयारी,
हँसने वाली आँखों में भी छिपी कहीं कुछ नमी रही;
कोई गीत जिसे पूरा करने में इतने गीत रचे,
उसके पूरा होने में हर बार ज़रा सी कमी रही |
लेकिन, कहाँ हार सकता मन सदा तुम्हारी चाह लिए,
फिर-फिर निकले चरण राह में रोज़ नया उत्साह लिए |
नए गीत छलके आँखों से, नए छंद परवान चढ़े,
अर्थों के पट पर शब्दों ने नए-नए प्रतिमान गढ़े |
कायम रहे तिलिस्म तुम्हारा, पल-पल मन को याद रहा,
तभी तुम्हारा नाम मुझे गूँगे के गुड़ का स्वाद रहा;
आँख खोलती जिस कविता की नज़रें तुम पर उठ जाएं,
कसमों-बिंधे होठ कैसे फिर उस कविता को गा पाएं?
एहतियात इतनी बरती फिर भी सुगंध सी बिखर गई,
इस भँवरे का फूल कहाँ है? कली-कली तक खबर गई |
हर तितली को पता चल गया, हर मधुमक्खी जान गई,
भँवरे की अनबोली चाहत हर क्यारी पहचान गई;
वही फूल बेखबर रहा बस, अपनी धुन में मस्त रहा,
केवल जिसके कारण भँवरा गुनगुन का अभ्यस्त रहा |
बागीचे भर गाता फिरता, हर कोने हो आता है,
उस गुल के ही इर्द-गिर्द भँवरा क्यों चुप हो जाता है?
जिस गुनगुन पर इतराता है, मात उसी से खा जाता,
और कभी टोको तो उड़ते-उड़ते यूँ दोहरा जाता -
'पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है,
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारा जाने है |'

-- आशुतोष द्विवेदी 

Thursday, February 21, 2019

चोर घुस गए कैसे भीतर?


चोर घुस गए कैसे भीतर?
आओ, दरबानों से पूछें !
(१)
दस-दस पहरेदार दिए थे,
हाथों में हथियार दिए थे,
थी ड्यूटी दिन-रात बजानी,
चौबीस घंटों की निगरानी;
चूक हो गई क्यों ऎसी फिर?
चोर घुस गए कैसे आखिर?
सेंध लगाई गई कहाँ पर,
चलकर तहखानों से पूछें !
(२)
एक सिपाही बोला रोकर,
एक कहानी कहता हूँ, सर,
एक रात नज़रों से छुप के,
चोर घुसा एक चुपके-चुपके;
मेरे भाई ने पकड़ा था,
अपनी बाँहों में जकड़ा था;
सिसक उठा वह इतना कहकर –
और निगहबानों से पूछें !
(३)
उसके सुर में सुर लिपटाए,
और सिपाही कहने आए –
चोर पैरवीवाला था जी,
वो मालिक का साला था जी;
धुत्त नशे में आया वापस,
जुआ खेलकर लौटा था बस,
खूब लड़ा पकड़े जाने पर,
साथी मरदानों से पूछें !
(४)
शोर सुना तो मालिक आए,
औ’ साले को पिटता पाए,
लाल हो गए मालिक-मलकिन,
खो बैठे थे आपा उस छिन;
मेरे भाई को धर पीटा,
खूब लताड़ा, खूब घसीटा,
किया काम से उसको बाहर,
किन आँखों-कानों से पूछें ?
(५)
किया पुलिस के उसे हवाले,
पड़े ज़मानत के भी लाले,
तब से हमने सबक लिया है,
जाने किसकी पहुँच कहाँ है?
कोइ नहीं देगा शाबाशी,
हल्की-फुल्की करो तलाशी;
जो जाता, जब जाए भीतर,
हम क्यों मेहमानों से पूछें?
(६)
इस चक्कर में चोर घुस गए,
रात नहीं, थी भोर, घुस गए;
छोड़ रहे थे नया शगूफा,
बनते थे मालिक के फूफा;
‘फूफा जी से भिड़ने जाएं,
फिर मालिक के जूते खाएं?
फिर पिट जाएं, ड्यूटी देकर?’ -
बड़े खानदानों से पूछें ! 
(७)
जो गरीब ड्यूटी देता है,
बदले में रोज़ी लेता है;
रोज़ी को ईमान समझता,
ड्यूटी अपनी शान समझता;
उसे समझना बिना सियासत,
वेतन के संग देना इज्ज़त;
‘कर पाएंगे बड़े-बड़े दर?’ –
क्या बेईमानों से पूछें !!


-- आशुतोष द्विवेदी
(पुलवामा हमले के बाद)



Monday, July 9, 2018

ख्वाहिशें

कभी मैं सोचता हूँ, बस हवा के साथ बह जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, हर गली में याद रह जाऊँ; 
कभी मैं सोचता हूँ, बाँसुरी की धुन में बोलूँ मैं;
कभी मैं सोचता हूँ, भ्रमर की गुनगुन में बोलूँ मैं;
कभी मैं सोचता हूँ, शंख कि साँसों में भर जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सीप के दिल में उतर जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, हर व्यथा का गान बन जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, होठ पर मुसकान बन जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, इन्द्रधनु में नए रँग भर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, पीले पत्तों को हरा कर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, पेड़ की शाखों पे’ जा लटकूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, जंगलों में दूर तक भटकूँ |
कभी मैं सोचता हूँ, सोचने का कायदा क्या है?
कभी मैं सोचता हूँ, सोचने से फायदा क्या है?
कभी मैं सोचता हूँ, “सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
कभी मैं सोचता हूँ, “ना ही होता, किसलिए मैं हूँ?”
कभी मैं सोचता हूँ, भीड़ में पहचान बच पाए;
कभी मैं सोचता हूँ, दफ्तरों से जान बच पाए;
कभी मैं सोचता हूँ, घर से बाहर भी न आऊँ मैं;
कभी मैं सोचता हूँ, देर तक घर ही न जाऊँ मैं |
कभी मैं सोचता हूँ, जी को हर दम कैसे बहलाऊँ?
कभी मैं सोचता हूँ, बोर होकर मैं न मर जाऊँ!
कभी मैं सोचता हूँ, ब्रह्म के परिमाप को खोजूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सिर्फ अपने आप को खोजूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सब किताबें ज़हन में भर लूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सब किताबों को दफ़न कर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, गीत की ऊँचाइयाँ छूलूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, मौन की गहराइयाँ छूलूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, काव्य-कृति में ज़िन्दगी भर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, ज़िन्दगी को काव्य-मय कर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सब हदों के पार हो जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, टूट कर दो-चार हो जाऊँ |
मगर, सोचा हुआ सब आदमी का, हो कहाँ पाता?
इसी अफ़सोस के साए में दिल ये शेर दोहराता –
“हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे’ दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले |”


Thursday, June 28, 2018

जीवन बेढंगा है


जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

(१)
पेशे से नौकर हैं,
बनते फिलासफर हैं |
गप्पों में टाइगर हैं,
जीते डर-डर कर हैं |
मन ऐसा नकली है, पोंगा, पाखण्डी है,
बाहर तो सन्नाटा, भीतर बस दंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

(२)
लम्बी-लम्बी छोडें,
बौने सपने जोड़ें |
कच्चे मटके फोड़ें,
फूलों से दिल तोड़ें |
हर हरक़त ऐसे है, जैसे गन्दा नाला,
बोली जो फूटे तो बातों में गंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

 (३)
आँसू बिक जाने हैं,
आँखें दूकानें हैं |
झूठी मुसकानें हैं,
गीत, बस बहाने हैं |
मैनर्स हैं, कर्ट्सी है, फैशन, फॉर्मेलिटी है,
सच तो इनके आगे जैसे भिखमंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

(४)
दर-देहरी प्यासे हैं,
खोखले दिलासे हैं |
हर आहट झाँसे हैं,
रूह तक रुआँसे है |
कम-ज़र्फ़ मीडिया पर निर्भर अपना हाल,
असली में खस्ता है, ख़बरों में चंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

-- आशुतोष द्विवेदी
२८.०६.२०१८