गीत में फिर प्रीत की निर्बाध मादकता मिला दो | शब्द की तृष्णा बुझा दो, भाव की मदिरा पिला दो |
Thursday, February 24, 2022
Friday, June 11, 2021
ग़ज़ल ११ जून २०२१
बातें इस तरह भी खराब न हो जाएं कहीं,
ये जो आँसू हैं फिर शराब न हो जाएं कहीं !
गलतियाँ करते हो तो गिनतियाँ भी करते रहो,
बढ़ते-बढ़ते ये बेहिसाब न हो जाएं कहीं !
बड़ी जतन से हकीकत किये हैं जो लम्हे,
डर यही है कि फिर से ख्वाब न हो जाएं कहीं !
दिल में लहरें जो उठीं हैं उन्हें सँभाल भी लो,
मनचलेपन में ये सैलाब न हो जाएं कहीं !
ज़रा सी उलझनें जंजाल बन गईं अक्सर,
ये सितारे भी आफताब न हो जाएं कहीं !
वो मेरे दर्द की देहरी को लाँघना चाहे,
कोशिशें उसकी कामयाब न हो जाएं कहीं !
छोटे बच्चे हैं, इन्हें मज़हबी फितूर न दो,
बड़े होते ही ये कसाब न हो जाएं कहीं !
भागे फिरते हैं खुशबुओं के सताए हुए हम,
ये चंद शेर भी गुलाब न हो जाएं कहीं !
-- आशुतोष द्विवेदी
Thursday, January 28, 2021
ढोते ही रहते हैं संबंधों को
ढोते ही रहते हैं संबंधों को,
आदत सी पड़ी हुई है कंधों को ।
गिर गिर कर सौ सौ बार उठे होंगे !
फिर फिर अपनों के हाथ लुटे होंगे !
ऊपर ऊपर झूठी मुसकान लिए,
भीतर भीतर हर साँस घुटे होंगे !
पर छिप न सकी भावों की लाचारी,
चेहरे पर झलकी मन की बीमारी;
फिर भी जाने कैसे हैं ये अपने?
दुख दिखा न आँखों वाले अंधों को ।१
जब जब संवेदन का तूफान बढा़,
बहला फुसला कर मन को किया कड़ा;
अपनेपन का दायित्व निभाने में,
अपने को चौराहों पर किया खड़ा ।
दुविधाओं से टकराते लहर लहर,
डूबते रहे उतराते रहे मगर;
फिर भी जाने क्यों बूझ नहीं पाए,
भावुकता के इन गोरख धंधों को ? २
नेकी करके दरिया में डाल दिया,
अपने अगणित सपनों को मार दिया;
उनको यह साधारण सी बात लगी,
जिन पर अपनी साँसों को वार दिया ।
खुद से ही रूठे, खुद से ही माने,
आया न कभी कोई जी बहलाने ;
फिर भी जाने किस लिए निभाते हैं
जीवन के अनचाहे अनुबंधों को ? ३
Wednesday, October 28, 2020
Tuesday, July 14, 2020
तुम्हीं
Sunday, July 12, 2020
सहारे
जिंदा हैं किसी से किए वादों के सहारे।
गहराइयों का ज्ञान, न धाराओं की समझ,
हम तैर गए सिर्फ इरादों के सहारे ।
हासिल तो है मुश्किल मगर उम्मीद बहुत है,
रिश्ते निभा रहे हैं तकादों के सहारे।
सूखे में सारी उम्र गुजारा किया है दिल,
दो पल के तेरे सावन-ओ-भादों के सहारे।
घोड़े, वज़ीर, हाथी तो पूरे मज़े में हैं,
और जंग लड़ी जा रही प्यादों के सहारे।
मंदिर की रौनकें हैं चाहतों के नूर से,
है मूर्तियों में जान मुरादों के सहारे।
Thursday, June 25, 2020
कैद हैं
ये सब दिमाग वाले खयालों में कैद हैं।
टूटे हुए दिए तो अँधेरों के हैं गुलाम,
जलते हुए चिराग उजालों में कैद हैं।
यूँ नाउम्मीद जान है, दिल इस कदर हताश,
जितने जवाब थे वो सवालों में कैद हैं।
चेहरों की चमक में तो है बनने की कहानी,
मिटने के दर्द पाँव के छालों में कैद हैं।
इक तुम हो कि जो वक्त से आगे निकल लिए,
इक हम हैं जो गुजरे हुए सालों में कैद हैं।
जो लोग दूर से बड़े खामोश लग रहे,
वो लोग और बिगड़े बवालों में कैद हैं।
कुछ प्यास की चुभती हुई जंजीर में बँधे,
कुछ हैं, जो छलकते हुए प्यालों में कैद हैं ।
उस बेपनाह रूप के अनमोल खजाने,
सब सरफिरी अदाओं के तालों में कैद हैं।
