Thursday, February 21, 2019

चोर घुस गए कैसे भीतर?


चोर घुस गए कैसे भीतर?
आओ, दरबानों से पूछें !
(१)
दस-दस पहरेदार दिए थे,
हाथों में हथियार दिए थे,
थी ड्यूटी दिन-रात बजानी,
चौबीस घंटों की निगरानी;
चूक हो गई क्यों ऎसी फिर?
चोर घुस गए कैसे आखिर?
सेंध लगाई गई कहाँ पर,
चलकर तहखानों से पूछें !
(२)
एक सिपाही बोला रोकर,
एक कहानी कहता हूँ, सर,
एक रात नज़रों से छुप के,
चोर घुसा एक चुपके-चुपके;
मेरे भाई ने पकड़ा था,
अपनी बाँहों में जकड़ा था;
सिसक उठा वह इतना कहकर –
और निगहबानों से पूछें !
(३)
उसके सुर में सुर लिपटाए,
और सिपाही कहने आए –
चोर पैरवीवाला था जी,
वो मालिक का साला था जी;
धुत्त नशे में आया वापस,
जुआ खेलकर लौटा था बस,
खूब लड़ा पकड़े जाने पर,
साथी मरदानों से पूछें !
(४)
शोर सुना तो मालिक आए,
औ’ साले को पिटता पाए,
लाल हो गए मालिक-मलकिन,
खो बैठे थे आपा उस छिन;
मेरे भाई को धर पीटा,
खूब लताड़ा, खूब घसीटा,
किया काम से उसको बाहर,
किन आँखों-कानों से पूछें ?
(५)
किया पुलिस के उसे हवाले,
पड़े ज़मानत के भी लाले,
तब से हमने सबक लिया है,
जाने किसकी पहुँच कहाँ है?
कोइ नहीं देगा शाबाशी,
हल्की-फुल्की करो तलाशी;
जो जाता, जब जाए भीतर,
हम क्यों मेहमानों से पूछें?
(६)
इस चक्कर में चोर घुस गए,
रात नहीं, थी भोर, घुस गए;
छोड़ रहे थे नया शगूफा,
बनते थे मालिक के फूफा;
‘फूफा जी से भिड़ने जाएं,
फिर मालिक के जूते खाएं?
फिर पिट जाएं, ड्यूटी देकर?’ -
बड़े खानदानों से पूछें ! 
(७)
जो गरीब ड्यूटी देता है,
बदले में रोज़ी लेता है;
रोज़ी को ईमान समझता,
ड्यूटी अपनी शान समझता;
उसे समझना बिना सियासत,
वेतन के संग देना इज्ज़त;
‘कर पाएंगे बड़े-बड़े दर?’ –
क्या बेईमानों से पूछें !!


-- आशुतोष द्विवेदी
(पुलवामा हमले के बाद)



Monday, July 9, 2018

ख्वाहिशें

कभी मैं सोचता हूँ, बस हवा के साथ बह जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, हर गली में याद रह जाऊँ; 
कभी मैं सोचता हूँ, बाँसुरी की धुन में बोलूँ मैं;
कभी मैं सोचता हूँ, भ्रमर की गुनगुन में बोलूँ मैं;
कभी मैं सोचता हूँ, शंख कि साँसों में भर जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सीप के दिल में उतर जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, हर व्यथा का गान बन जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, होठ पर मुसकान बन जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, इन्द्रधनु में नए रँग भर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, पीले पत्तों को हरा कर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, पेड़ की शाखों पे’ जा लटकूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, जंगलों में दूर तक भटकूँ |
कभी मैं सोचता हूँ, सोचने का कायदा क्या है?
कभी मैं सोचता हूँ, सोचने से फायदा क्या है?
कभी मैं सोचता हूँ, “सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
कभी मैं सोचता हूँ, “ना ही होता, किसलिए मैं हूँ?”
कभी मैं सोचता हूँ, भीड़ में पहचान बच पाए;
कभी मैं सोचता हूँ, दफ्तरों से जान बच पाए;
कभी मैं सोचता हूँ, घर से बाहर भी न आऊँ मैं;
कभी मैं सोचता हूँ, देर तक घर ही न जाऊँ मैं |
कभी मैं सोचता हूँ, जी को हर दम कैसे बहलाऊँ?
कभी मैं सोचता हूँ, बोर होकर मैं न मर जाऊँ!
कभी मैं सोचता हूँ, ब्रह्म के परिमाप को खोजूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सिर्फ अपने आप को खोजूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सब किताबें ज़हन में भर लूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सब किताबों को दफ़न कर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, गीत की ऊँचाइयाँ छूलूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, मौन की गहराइयाँ छूलूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, काव्य-कृति में ज़िन्दगी भर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, ज़िन्दगी को काव्य-मय कर दूँ;
कभी मैं सोचता हूँ, सब हदों के पार हो जाऊँ;
कभी मैं सोचता हूँ, टूट कर दो-चार हो जाऊँ |
मगर, सोचा हुआ सब आदमी का, हो कहाँ पाता?
इसी अफ़सोस के साए में दिल ये शेर दोहराता –
“हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे’ दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले |”


Thursday, June 28, 2018

जीवन बेढंगा है


जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

(१)
पेशे से नौकर हैं,
बनते फिलासफर हैं |
गप्पों में टाइगर हैं,
जीते डर-डर कर हैं |
मन ऐसा नकली है, पोंगा, पाखण्डी है,
बाहर तो सन्नाटा, भीतर बस दंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

(२)
लम्बी-लम्बी छोडें,
बौने सपने जोड़ें |
कच्चे मटके फोड़ें,
फूलों से दिल तोड़ें |
हर हरक़त ऐसे है, जैसे गन्दा नाला,
बोली जो फूटे तो बातों में गंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

 (३)
आँसू बिक जाने हैं,
आँखें दूकानें हैं |
झूठी मुसकानें हैं,
गीत, बस बहाने हैं |
मैनर्स हैं, कर्ट्सी है, फैशन, फॉर्मेलिटी है,
सच तो इनके आगे जैसे भिखमंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

(४)
दर-देहरी प्यासे हैं,
खोखले दिलासे हैं |
हर आहट झाँसे हैं,
रूह तक रुआँसे है |
कम-ज़र्फ़ मीडिया पर निर्भर अपना हाल,
असली में खस्ता है, ख़बरों में चंगा है |
जीवन बेढंगा है,
अजब रंग रंगा है !

-- आशुतोष द्विवेदी
२८.०६.२०१८

Sunday, May 21, 2017

कुछ ताज़ा पंक्तियाँ

आँसुओं की पीरिऑडिक (periodic) शॉवरिंग (showering) तो चाहिए 
शायरी बगिया है, रेगुलर (regular) वाटरिंग (watering) तो चाहिए 

ज़िक्र से तेरे, ज़ुबाँ पर इक चटक सा टेस्ट (taste) है,
ज़िन्दगी की प्लेट (plate) में कुछ सीजनिंग (seasoning) तो चाहिए 

जी हुज़ूरी पर कड़े कानून बनवाते नहीं?
मगर मक्खन पर ज़रा सी राशनिंग (rationing) तो चाहिए 

ख्वाहिशों की लाश पर बकवास मत करिए, जनाब,
झूठ कैसा भी हो, वैलिड (valid) रीज़निंग (reasoning) तो चाहिए 

बहुत उम्मीदों से हमने आपको सौंपी कमान,
अब इन उम्मीदों को थोड़ी वेल-विशिंग (well-wishing) तो चाहिए 

रोड (road) पर मोटर (motor) को दौड़ाने के पहले जाँच लें,
पार्ट्स (parts) की प्रॉपर (proper) फिटिंग (fitting) और सर्विसिंग (servicing) तो चाहिए 

देर से आना गलत, तो देर से जाना गलत,
दफ्तरों में वेल-डिफाइंड (well-defined) टाइमिंग (timing) तो चाहिए 

काम जिसका हो, करे वो, और बस वो ही करे,
वर्क-आर्डर (work-order) में क्लियर-कट (clear-cut) लाइनिंग (lining) तो चाहिए