Wednesday, February 15, 2017

आओ हे ऋतुराज


आओ हे ऋतुराज, तुम्हारा स्वागत है,
बहुत दिनों के बाद सही, तुम आए तो |
***

बिछड़ गए पेड़ों से, लेकिन रो न सके,
मुरझाए पत्ते इतने मजबूर हुए;
रंग, रूप, रस और गंध के चित्रों से,
नयन हमारे जैसे कोसों दूर हुए |
पतझड़ जो हरियाली लेकर चला गया,
              उपवन तक फिर से लौटा कर लाए तो | आओ हे ऋतुराज.....
***

उजड़े मौसम का हर पल युग जैसा था,
मौन अधर प्यासे, उदास, अकुलाए थे;
सूनी डालें राह निहारा करती थीं,
माली भी सूनेपन से घबराए थे |
लेकिन अंतर में अब कोई क्लेश नहीं,
              आज सुमन फिर आँगन में मुसकाए तो | आओ हे ऋतुराज.....
***

मंजरियों की सुरभि हवाओं में फैली,
कलियों ने खिलकर सादर सत्कार किया;
रूप सृष्टि का आज निखर आया ऐसे,
जैसे कवि ने कविता का शृंगार किया |
आज तितलियों के पंखों ने गति पायी,
                चलो, भ्रमर फिर मस्ती में बौराए तो | आओ हे ऋतुराज.....
***

 नयनों में, अधरों पर खुशियाँ छा जातीं,
राग-रंग फिर से यौवन को पा जाते;
हृदयों पर संदेश तुम्हारी खातिर था,
अच्छा होता जितनी जल्दी आ जाते |
बस मेरी बगिया की कोई बात नहीं,
                 कहीं और ही सही, कोकिला गाए तो | आओ हे ऋतुराज.....
***


Wednesday, February 1, 2017

पड़ताल

रेल की धड़धड़ाती आवाज़ के मुकाबले
और भी ज़ोर से धड़कता दिल |
आखिर किस वजह से?
शायद तुमसे मिलने की अकुलाहट,
शायद बहुत कुछ बताने की छटपटाहट,
शायद लंबे रास्ते के धीरे-धीरे कटने की झुंझलाहट,
या फिर शायद खयालों के दरवाजे पर बार-बार तुम्हारे आने की आहट !
कारण चाहे जो भी हो, निवारण कोई नहीं |
इस आवाज़ को सुनते हुए ही करनी है सारी यात्रा,
गुज़ारना है पूरा वक़्त और तय करना है ये लंबा सफर |
अब ये आवाज़ बेचैन करे,
या बेचैन होने से पहले मैं इसे अपना लूँ,
इसका आदी हो जाऊँ;
कुछ भी हो जाए, मगर अब ये हमसफर है, हमराह है |
ऐसा तो नहीं कि ये कोई सरफिरी सी चाह है?
जो सिर्फ देह के तल पर उठती है, और
देह को तोड़ती है, मरोड़ती है, निचोड़ती है, झकझोड़ती है,
चीखती है, चिचियाती है, तूफान मचाती है,
दिल-ओ-दिमाग तक खँगाल आती है |

दिल और दिमाग, मन और मस्तिष्क,
ये क्या देह के भाग हैं?
शायद नहीं !
ये देह से अलग कुछ हैं,
जिन पर देह का असर होता है,
और देह जिन पर असर करती है?
इस बात की पड़ताल में, धड़कती आवाज़ के सहारे,
मैं आगे बढ़ने की कोशिश करता हूँ, मगर
सिर्फ आवाज़ों के शीशों से टकराकर नीचे गिर जाता हूँ |
शीशे? हाँ, शीशे,
आवाज़ों के शीशे? हाँ भाई!
ये आवाज़ें सिर्फ आवाज़ें नहीं हैं, 
इनमें साथ चिपके हैं अनेक प्रतिबिंब,
हजारों चित्र, लाखों आकृतियाँ,
हँसती, मुसकुराती, डोलती, इठलाती,
रोती, कराहती, सिसकती, पुकारती,
रीझती, खीझती, रूठती, मनाती,
फटकारती, दुतकारती,
दुलारती, पुचकारती,
धुँधली, चमकती,
ठहरी, भटकती,
कभी नयनों को लुभाती, कभी आँखों को खटकती |

क्या इनके पार कुछ है?
क्या इनके पार जाया जा सकता है?
क्या इनके पार जाने की जरूरत है?
ये तीन प्रश्न फिर-फिर सामने खड़े हो जाते हैं |
इनमें से तीसरे प्रश्न का उत्तर यदि नहीं है
तो बात खतम;
लेकिन उत्तर यदि हाँ है तो फिर पहला प्रश्न सामने
कि क्या इनके पर कुछ है?
लेकिन इसका उत्तर नहीं पाया जा सकता
दूसरे प्रश्न को हल किए बिना
कि क्या इनके पर जाया जा सकता है?
लेकिन इस प्रश्न के साथ ही उपजता है एक चौथा प्रश्न
कि इनके पार कैसे जाया जा सकता है?
अब इस प्रश्न के ही इर्द-गिर्द घूमने लगता है
मेरा पूरा अस्तित्व, बार-बार, लगातार,
धड़धड़ाती, भड़भड़ाती आवाज़ में लिपटा |

-- आशुतोष द्विवेदी 


Tuesday, December 27, 2016

आँसुओं की मौत पर - एक कविता

आज हम लिखते हैं आओ,
आँसुओं की मौत पर |
आँख है सूखी हुई, रूखी हुई,
और नज़र जैसे तप रही मरुभूमि,
वीरानी लपेटे |
क्षितिज तक बिखरी हुई, बंज़र पड़ी,
मनहूस घबराहट;
कलेजा मुँह को आ जाए,
तपिश कुछ इस तरह की |
सुनाई दे रही हैं घरघरातीं,
किसी उजड़े हुए से कारखाने की तरह,
अपनी ही घायल धड़कनों की सख्त आवाज़ें |
फफकती, हाँफती, उखड़ी हुई साँसें,
कि जैसे धौंकनी रफ़्तार में चलती हुई हो |
बदन को जकड़ती नस-नाड़ियाँ,
जिनमें नहीं है खून, शायद,
बह रहा पिघला हुआ लोहा |
सताए धधकती उद्दाम तृष्णा के,
पड़े पीले हुए, पतझार में लाचार,
मुरझाए हुए पत्तों से बेसुध फड़फड़ाते होठ |
होठों की दरारों से डरी, सहमी हुई सी झाँकती
कुछ बोलने की, या
किसी को ज़ोर से आवाज़ देने की तड़प,
चाहत बहुत कुछ कह गुज़रने की |
कटीली झाड़ियों की तेज़ नोकों में फँसे, लिपटे,
अधूरी आस के आँचल के अगणित चीथड़े |
इन चीथड़ों के साथ चिंदी हो गए
सपनों के दस्तावेज सारे |
नीतियों की चीखतीं मासूम चिड़ियों 
के कटे पाँखों के रेशे |
किसी खूँखार, गुस्साए हुए, बेचैन,
भूखे भेड़िये सा घूरता सूरज |
यहाँ सड़ती हुईं, दुर्गंध फैलाती हुईं,
लाशें हमारे आँसुओं की,
एक-दूजे पर लदी, लेटी हुई हैं |
इन अभागे आँसुओं की मौत पर
अब और ज़्यादा क्या लिखें?
भगवान, इनकी आत्मा को शांति देना |


-    आशुतोष द्विवेदी
     28.12.2016